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पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के नतीजों ने किसान आंदोलन की ताक़त को साबित कर दिया

भारतीय किसान आंदोलन ने इतिहास के पृष्ठों में अपना नाम दर्ज कर लिया है। अगर देश के किसान मजबूती से खड़े नहीं होते तो भारत का लोकतंत्र लगभग खो चुका था।

05 मई 2021: यह स्पष्ट था कि अगर भाजपा पश्चिम बंगाल चुनाव जीतती है तो उसका पहला कदम होता की वो देश में चल रहे किसान आंदोलन को बल पूर्वक खत्म करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ती| किसान नेताओं को यह पता था कि पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले है और इसलिए उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बेनर्जी की TMC पार्टी को मदद करने के लिए अपने स्तर पर पूरी कोशिश की। इसी का नतीजा है की भाजपा अपने पूरे दमखम के बाद भी बंगाल चुनाव बुरी तरह से हार गए | इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजे भी बता रहे हैं कि बीजेपी के लिए अब उत्तर प्रदेश में भी जगह नहीं है| यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसानों ने भारत की जनता और विपक्षी राजनीतिक दलों को मज़बूती दी है | किसान आंदोलन से पहले पूरे देश की जनता, विपक्ष, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सभी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के तानाशाही शासन को लगभग स्वीकार कर लिया था |

किसान आंदोलन ने भारतीय नागरिकों के साथ-साथ विपक्ष को भी एक नई ताकत दी

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा घोषित 03 कृषि कानूनों का विरोध करते हुए लगभग 05 महीने से अधिक हो गए हैं। भारतीय इतिहास में इस तरह के विरोध के बारे में पूरी दुनिया में किसी ने भी नहीं सोचा था। पूरे विश्व की यह धारणा थी कि भारत पर शासन करना आसान है क्योंकि भारतीयों ने पिछले कुछ वर्षों में अपने कमजोर और भ्रष्ट व्यवहार का परिचय दिया है। भारत में धर्म और जाति के आंतरिक संघर्षों के बारे में पूरी दुनिया को पता है। भारतीय किसान आंदोलन ने भारत की अस्मिता को बचाया और यह भी साबित किया कि भारत एक जनतंत्र हैं जिसपर तानाशाही शासन करना नामुमकिन है | सबसे पहले पंजाब में नगर निकाय चुनाव, फिर पश्चिम बंगाल और अब उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजों ने सभी विपक्षी दलों में एक जान सी डाल दी है| हालाँकि विपक्ष इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेगा लेकिन हक़ीक़त यह नहीं है कि भारत की जनता उनसे खुश है और इसलिए वह जीत रहे हैं| इसके विपरीत जनता कुछ भी करके नरेंद्र मोदी और अमित शाह को हराना चाहती है और सिर्फ यही कारण है की विपक्षी दल चुनाव जीत रहे हैं |

बंगाल चुनाव के नतीजों ने किसानआंदोलन की ताक़त को साबित कर दिया
14 मार्च को बंगाल से प्रयागराज एयरपोर्ट आगमन पर किसानों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा स्वागत

किसान आंदोलन – ग्रामीण भारत की प्रमाणित ताकत

कोई भी विश्वास नहीं कर सकता है कि वह देश जो हमेशा धर्म और जाति जैसे विषयों पर आपस में लड़ता रहता था, वो एक साथ मिलकर एक सामान्य कारण के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा होगा। संभवतः किसान नेता राकेश टिकैत, युद्धवीर सिंह, गुरनाम चढूनी ,बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शनपाल सिंह और योगेंद्र यादव सहित बाकि सभी किसान नेताओं ने शुरू में इतनी लंबी लड़ाई की उम्मीद नहीं की होगी। शुरुआत में किसानों ने तीन कृषि कानूनों को खत्म करने के इरादे से आंदोलन शुरू किया और बाद में यह विरोध देश के लिए एक लोकतंत्र रक्षक बन गया। 1988 के बाद यह पहला मौका है जब किसान नेता महेंद्र टिकैत (जिन्हें बाबा टिकैत के नाम से जाना जाता है) ने 5 लाख किसानों के साथ दिल्ली बोट क्लब पर आंदोलन किया था| मैं उस समय बहुत छोटा था, लेकिन मैं केवल कल्पना कर सकता हूं जहाँ दिल्ली के लुटियंस ज़ोन की हरी घास को पशु चर रहे होंगे। भारतीय किसान आंदोलन 2020-21 के परिणामस्वरूप एक मज़बूत और शक्तिशाली विरोध हुआ जो ग्रामीण भारत की ताकत साबित हुआ। यह किसान आंदोलन अपनी नीतियों के मामले में अधिक एकजुट और मजबूत लगता है। समूचे भारत ने ऐसे आंदोलन की कल्पना भी नहीं की होगी, जिसमें 36 जातियाँ एक साथ मिलकर एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं |

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर से भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष श्री नरेश टिकैत किसानो को सम्बोदित करते हुए

भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता शुरू से ही जानते थे कि किसान आंदोलन एक बड़े विस्फोट का लेकर आ सकता है

भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को किसानों और उनकी ताकत के अनुभव था, लेकिन शायद वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इसके परिणाम समझाने में विफल रहे। भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को किसानों के साथ अच्छा अनुभव है जब वह वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। लेकिन शायद वह भी प्रधानमंती नरेंद्र मोदी और अमित शाह को किसानो की ताक़त को समझाने में विफल रहे। डिग्पू समाचार प्रतिनिधि द्वारा एकत्र की गई आंतरिक जानकारी के अनुसार भाजपा के कई वरिष्ठ मंत्री अप्रत्यक्ष रूप से किसानों के साथ हैं और उनकी मदद भी कर रहे हैं । बीजेपी के कई बड़े और छोटे राजनेता खुद महसूस करने लगे हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह सरकार देश विरोधी है | शायद यही कारण है की उत्तर प्रदेश, हरयाणा, राजस्थान के अलावा भाजपा के कई नेता अपनी ही पार्टी के विरोधी हो गए हैं |

किसान विरोध और पश्चिम बंगाल में बीजेपी की हार : अडानी और अंबानी जैसे उद्योगपतिओं के लिए झटका

वैसे तो बड़े उद्योगपति को किसी भी पार्टी की हार और जीत से कोई खास फर्क नहीं पड़ता | वे अपने लाभ के आधार पर लगभग हर पार्टी को चंदे के रूप में करोड़ो रूपया देते हैं, परन्तु अडानी और अंबानी जैसे भारत के बड़े उद्योगपति शायद इस बार बीजेपी की हार से प्रभावित होंगे | इसका सबसे बड़ा कारण है दोनों कॉर्पोरेट्स की मौजूदा सत्तारूढ़ दल बीजेपी की नीतियों पर आधारित रणनीति में अधिक निवेश करना। किसान विरोध के कारण दोनों कॉरपोरेट्स पहले ही सार्वजनिक रूप से अपनी प्रतिष्ठा खराब कर चुके हैं , शायद इन दोनों कॉरपोरेट्स ने पहले ही भारतीय कृषि उद्योग में बहुत अधिक निवेश कर दिया है| अगर 2024 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के पद से हट जाते हैं जो कि एक बड़ी सम्भावना है तो इस दिशा में अडानी जैसे उद्योगपतियों को बड़ा नुक्सान होने की भी सम्भावना है |

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