असफल कूटनीति, खाड़ी देशों के अरबों डॉलर, एपस्टीन फाइलें और भारत से जुड़ते सवाल
दुनिया इस समय जिस सवाल से जूझ रही है, वह बेहद सीधा है – अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ युद्ध क्यों शुरू किया?
यह सवाल इसलिए और जटिल हो जाता है क्योंकि इसका स्पष्ट जवाब खुद ट्रंप भी नहीं दे पाए। अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth और विदेश मंत्री Marco Rubio ने भी वही आधिकारिक तर्क दोहराया—कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब था।
लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट इस कहानी को पूरी तरह समर्थन नहीं देती। कई रक्षा रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया कि ईरान सक्रिय रूप से परमाणु हथियार विकसित नहीं कर रहा था और यूरेनियम संवर्धन भी अंतरराष्ट्रीय निगरानी के भीतर था। चिंता केवल इस बात की थी कि ईरान के पास स्पेस-लॉन्च तकनीक है, जो भविष्य में लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता में बदल सकती है।
जब यह आकलन अमेरिका की खुफिया प्रमुख Tulsi Gabbard ने सार्वजनिक रूप से दोहराया, तो रिपोर्ट्स के अनुसार इससे ट्रंप नाराज़ हो गए।
तो फिर असली कारण क्या था? इसका जवाब हमें उन घटनाओं की श्रृंखला में मिलता है जो युद्ध से ठीक पहले तेजी से घटित हुईं।

फरवरी 2026: जब कूटनीति टूट गई
फरवरी 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच तीन दौर की गुप्त वार्ताएँ हुईं। इन बैठकों की मध्यस्थता ओमान के अधिकारियों ने की।
अमेरिका की ओर से बातचीत का नेतृत्व कर रहे थे ट्रंप के बेहद करीबी दो लोग—
Jared Kushner और Steve Witkoff
ईरान की ओर से प्रतिनिधित्व कर रहे थे विदेश मंत्री Abbas Araghchi।
पहली बैठक 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी Muscat में हुई। ईरान चाहता था कि बातचीत उसके परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन के अधिकार पर केंद्रित हो। अमेरिका चाहता था कि संवर्धन लगभग पूरी तरह बंद कर दिया जाए।
कोई समझौता नहीं हुआ।
दूसरी बैठक 17 फरवरी को Geneva में हुई। ईरान ने संवर्धन (Uranium) की सीमा तय करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन अमेरिका ने शून्य संवर्धन की मांग रखी।
एक बार फिर बातचीत विफल रही।
तीसरा और अंतिम दौर 26 फरवरी को भी जिनेवा में हुआ। कई घंटों तक चली बातचीत से कूटनीतिज्ञों को उम्मीद थी कि कोई समाधान निकल सकता है। लेकिन अंततः वार्ता पूरी तरह टूट गई।
और सिर्फ दो दिन बाद दुनिया ने एक नाटकीय घटना देखी।

तेहरान पर हमला और सत्ता परिवर्तन
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त हवाई कार्रवाई में तेहरान में ईरानी नेतृत्व की एक बैठक को निशाना बनाया गया।
इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और कई शीर्ष सैन्य अधिकारी मारे गए। इसके तुरंत बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और खामेनेई के परिवार से ही एक नए युवा नेता को सर्वोच्च पद पर बैठा दिया गया।
दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा कि क्या यही वह “रेजीम चेंज” था जिसकी ओर ट्रंप लंबे समय से संकेत दे रहे थे।
भारतीय कनेक्शन: एक संयोग या रणनीति?
इस पूरी कहानी में एक और दिलचस्प घटना सामने आई।
हमले से ठीक 48 घंटे पहले भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi अचानक इज़राइल पहुंचे। 26 फरवरी को उन्होंने इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu से मुलाकात की।
ध्यान देने वाली बात यह है कि उसी दिन जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम वार्ता भी चल रही थी।
कूटनीतिक हलकों में कई लोगों ने इस समय को असामान्य बताया। यह यात्रा सामान्य राजनयिक कैलेंडर में पहले से घोषित नहीं थी और काफी जल्दबाजी में आयोजित हुई।
क्या यह केवल संयोग था, या किसी बड़े भू-राजनीतिक समन्वय का हिस्सा?

एपस्टीन फाइलें: क्या युद्ध एक ध्यान भटकाने वाला कदम था?
इसी दौरान फिर से चर्चा में आईं Jeffrey Epstein से जुड़ी फाइलें।
इन दस्तावेजों में दुनिया की कई प्रभावशाली हस्तियों के नाम सामने आए, जिनमें Donald Trump, Bill Clinton, Ehud Barak, Prince Andrew, Elon Musk, Bill Gates और Richard Branson जैसे नाम शामिल बताए जाते हैं।
एपस्टीन की 2019 में न्यूयॉर्क जेल में मौत को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया था, लेकिन आज भी कई लोग इस कहानी पर संदेह करते हैं।

एपस्टीन फाइलों में भारत का उल्लेख
नई न्याय विभाग की फाइलों में भारतीय उद्योगपति Anil Ambani का नाम भी सामने आया।
दस्तावेजों में कुछ ईमेल आदान-प्रदान का उल्लेख है जिनमें इज़राइल यात्रा और कूटनीतिक संपर्कों की चर्चा बताई गई। भारत के केंद्रीय मंत्री Hardeep Singh Puri का नाम भी इन दस्तावेजों में सामने आया, जिन्होंने स्वीकार किया कि वे अतीत में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में एपस्टीन से मिले थे।
इन खुलासों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए।

खाड़ी देशों का पैसा और अमेरिकी गठबंधन
इस कहानी का दूसरा पहलू आर्थिक है।
ट्रंप के दामाद Jared Kushner ने व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद निवेश फर्म Affinity Partners शुरू की। 2022 में सऊदी अरब के पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड से उसे लगभग 2 अरब डॉलर का निवेश मिला। बाद में कतर और अबू धाबी से 1.5 अरब डॉलर अतिरक्त निवेश आया।

ट्रंप के करीबी सहयोगी Steve Witkoff के होटल को कतर के संप्रभु फंड ने सैकड़ों मिलियन डॉलर में खरीदा। इसी दौरान ट्रंप परिवार से जुड़ी क्रिप्टो परियोजनाओं में भी अरबों डॉलर के निवेश की खबरें सामने आईं।
इन घटनाओं ने अमेरिकी राजनीति में गंभीर सवाल खड़े किए कि क्या खाड़ी देशों का पैसा अमेरिकी नीति को प्रभावित कर रहा था।

युद्ध का विस्तार और वैश्विक असर
खामेनेई की हत्या के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में कई लक्ष्यों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर पड़ा Strait of Hormuz पर, जहां से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
जैसे ही यह मार्ग अस्थिर हुआ, वैश्विक तेल कीमतों में तेजी से उछाल आ गया। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों—जिनमें भारत भी शामिल है—पर इसका सीधा आर्थिक प्रभाव पड़ने लगा।
एक युद्ध, कई परतें
जब इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाता है, तो तस्वीर बेहद जटिल दिखाई देती है।
एक तरफ असफल कूटनीति है। दूसरी तरफ खाड़ी देशों से जुड़े अरबों डॉलर के निवेश। तीसरी तरफ एपस्टीन फाइलों के नए खुलासे।
और फिर अचानक शुरू हुआ एक युद्ध।
सिर्फ दो हफ्तों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। ईरान में नया नेतृत्व स्थापित हो चुका है। तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और पूरी दुनिया आर्थिक दबाव महसूस कर रही है।
इसलिए यह सवाल अब भी बना हुआ है – क्या यह युद्ध वास्तव में सुरक्षा के लिए था, या फिर यह वैश्विक राजनीति, पैसे और शक्ति के जटिल खेल का हिस्सा है?
दुनिया शायद आने वाले वर्षों में ही इसका पूरा जवाब जान पाएगी।

