हे – सरकार , रोटी का जुगाड़ कर दो फिर लॉक डाउन कर दो

by Pawan Dev

हे – सरकार हम गरीब मजदुर हैं या तो भूख से मर जायेगें या कोरोना से – मरना तो हैं ही

कोविड 19 वैश्विक महामारी ने देश दुनिया में सामाजिक , आर्थिक और राजनेतिक स्थर पर  सभी देशो को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया हैं यह एक बड़ा सवाल हैं की क्या लॉक डाउन ही इस महामारी का विकल्प था गौरतलब हैं कई   बुध्धिजीवी   इस पर अलग अलग तर्क देते नज़र आते हैं डब्ल्यूएचओ के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर माइक रायन ने कहा कि कोरोना वायरस को रोकने के लिए सिर्फ़ लॉकडाउन किया जाना ही कारगर तरीका नहीं है  लॉक डाउन के विषय में एक बात तो तय होती हैं की कौन देश अपनी देश की जनता के लियें संवेदनशील हैं और इस   वैश्विक  आपदा में प्रबन्धक कैसा किया |

 भारत के संदर्भ में देखा जायें तो द्रश्य नकारात्मक नज़र आते हैं भारत की सरकार ख़ास कर वर्तमान सरकार को भारत की जनता का एक बड़ा वर्ग इवेंट ( प्रघटना ) मैनजमेंट या प्रचार सरकार कहते हैं जिसका बड़ा उदहारण प्रधानमंत्री मोदी ने देश में  22 मार्च 2020   ताली कटोरी बजा कर कोविड को भगाने की कोशिश कर चुके हैं ऐसे कई उदाहरण आप को देखने को मिल सकते हैं

भारत में एका एक लगा लॉक डाउन ने आम आदमी को खून के आसूं रुला दियें –

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एका एक टीवी पर आकर  24 मार्च को  यह घोषणा कर दी की  21 दिनों के लिए पूरे देश में  लॉकडाउन रहेगा और फिर यह बढ़ता रहा लेकिन इस लॉक डाउन ने आम जनता की कमर तोड़ दी मजदुर वर्ग के लोगों पर तो जैसे पहाड़ ही टूट गया हजारों किलोमीटर की यात्रा बेसहारा लोगों ने पैदल ही तय कर दी और अपने परिवार तक पहुंचे दूसरी घटना एक बेटी की हैं वह शायद आप को याद होगी अपने बीमार पिता को साइकिल पर बेठा कर राजधानी  दिल्ली  से बिहार कूच कर गई थी उस  दर्द पीड़ा को  जब आप आँख बंद  कर के एक सकेंड के लियें ख़ुद पर विचार करेगें तो आप पीड़ा को महसूस कर पायेगें –

भारत में 2020 कोरोनावायरस महामारी का आर्थिक प्रभाव काफी हद तक विघटनकारी रहा है। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में भारत की वृद्धि दर घटकर 3.1% रह गई। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था -4.5 की दर से सिकुड़ गई हैं |

विश्व बैंक और रेटिंग एजेंसियों ने शुरू में वित्त वर्ष 2021 के लिए भारत के विकास का पूर्वानुमान किया जो कि भारत के 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद के तीन दशकों में सबसे कम आंकड़ों के साथ देखा गया अनुमान था। रिपोर्ट में वर्णित है कि यह महामारी ऐसे वक्त में आई है जबकि वित्तीय क्षेत्र पर दबाव के कारण पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती की मार झेल रही थी। कोरोना वायरस के कारण इस पर और नकारात्मक दवाब बढ़ा है। हालाँकि, मई के मध्य में आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद के अनुमानों को नकारात्मक आंकड़ों से और भी अधिक घटा दिया गया था। यह एक गहरी मंदी का संकेत था।

भारत सरकार ने केरल में 30 जनवरी 2020 को कोरोनावायरस के पहले मामले की पुष्टि की जब वुहान के एक विश्वविद्यालय में पढ़ रहा छात्र भारत लौटा था। 22 मार्च तक भारत में कोविड-19 के पॉजिटिव मामलों की संख्या 500 तक थी, इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 मार्च को सभी नागरिकों को 22 मार्च रविवार को सुबह 7 से 9 बजे तक ‘जनता कर्फ्यू’ करने को कहा था।

कोरोनावायरस के कारण पूरे देश में लाॅकडाउन होने के कारण कई सरकारी व्यवसाय और उद्योग प्रभावित हुए हैं। घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते आर्थिक वृद्धि दर प्रभावित हुई है। वहीं जोखिम बढ़ने से घरेलू निवेश में सुधार में भी देरी होने की संभावना दिख रही है। विश्व बैंक के अनुसार इस महामारी की वजह से भारत ही नहीं बल्कि समूचा दक्षिण एशिया गरीबी उन्मूलन से मिलें फायदे को गँवा सकते  है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ ने कहा है कि कोरोना वायरस सिर्फ़ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये एक बड़ा लेबर मार्केट और आर्थिक संकट भी बन गया है जो लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ा है और हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत जीडीपी अनौपचारिक क्षेत्र से ही आता है, ऐसे में ये क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान काम नहीं कर पा रहे, वो कच्चा माल नहीं ख़रीद पा रहे और बनाया हुआ माल बाज़ार में नहीं बेच पा रहे थे  जिससे उनकी कमाई बंद सी पड़ गई थी  कोरोनावायरस दुनिया में कहीं और की तुलना में भारत में तेजी से फैल रहा है, भारत में वर्तमान में 36 लाख से अधिक मामले हैं, और 65 हजार से अधिक मौतें हुई हैं। इस कारण भारत में मज़दूरों की कमी को कारण रोजगार को बड़ा नुकसान हुआ है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सार्वजनिक वित्त को लेकर खींचतान के बीच कोरोनावायरस मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है और मुद्रास्फीति बढ़ने का मतलब है कि सुधार जल्दी नहीं हो सकती है। कुछ का कहना है कि अर्थव्यवस्था में मार्च 2021 के माध्यम से वर्ष में लगभग 10 प्रतिशत का संकुचन देखा जा सकता है।]  लॉक  डाउन के शुरू के दिनो में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश में 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को साकार करने के लिए घरेलू उद्योग को अधिक आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया था लेकिन जमीनी आधार पर यह एक जूमला सा प्रतीत हो रहा हैं |

लॉकडाउन के दौरान अनुमानित 14 करोड़ लोगों ने रोजगार खो दिया  था  जबकि कई अन्य लोगों के लिए वेतन में कटौती की गई थी। देश भर में 45% से अधिक परिवारों ने पिछले वर्ष की तुलना में आय में गिरावट दर्ज की है। पहले 21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को हर दिन 32,000 करोड़ से अधिक की हानि होने की आशंका थी लेकिन आकड़ें चिंतित करने वाले हैं । पूर्ण लॉकडाउन के तहत भारत के $2.8 ट्रिलियन आर्थिक संरचना का एक चौथाई से भी कम गतिविधि कार्यात्मक थी। अनौपचारिक ( खुला धंधा )  क्षेत्रों में कर्मचारी और दिहाड़ी मजदूर सबसे अधिक जोखिम वाले लोग हैं। देश भर में बड़ी संख्या में किसान जो  फल-सब्जी उगाते हैं, उन्हें भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ा। महामारी से ठीक पहले, सरकार ने कम विकास दर और कम मांग के बावजूद 2024 तक अर्थव्यवस्था को अनुमानित $2.8 ट्रिलियन से $5 ट्रिलियन तक बदलने का लक्ष्य रखा था यह सरकार के लियें एक चुनोतीपूर्ण टास्क हैं |

सुधार के प्रयास

भारत सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए कई उपायों की घोषणा की जिनमें खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और राज्यों के लिए अतिरिक्त धन और कर चुकाने की समय सीमा बढ़ाना । 26 मार्च को गरीबों के लिए कई तरह के आर्थिक राहत उपायों की घोषणा की गई जो कुल 1,70,000 करोड़ से अधिक थे। अगले दिन भारतीय रिजर्व बैंक ने भी कई उपायों की घोषणा की जो देश की वित्तीय प्रणाली को 3,74,000 करोड़ उपलब्ध कराएंगे। साथ ही भारतीय रिज़र्व बैंक ने अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए मार्च के बाद से प्रमुख ब्याज दरों में 115 आधार अंकों (1.15 प्रतिशत अंक) की कमी की है।विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक ने कोरोनावायरस महामारी से निपटने के लिए भारत को समर्थन को मंजूरी दी।

12 मई को प्रधान मंत्री ने राष्ट्र के नाम एक संबोधन में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की घोषणा की। इसमें समग्र आर्थिक पैकेज के रूप में 20 लाख करोड़ का पॅकेज घोषित किया गया। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 10% है। हालांकि यह प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई को घोषित किया गया था लेकिन इसमें आरबीआई की घोषणाओं सहित पिछले सरकारी राहत पॅकेज को शामिल किया गया था। 15 मार्च को बेरोजगारी दर 6.7% थी जो 19 अप्रैल को बढ़कर 26% हो गई। फिर मध्य जून तक पूर्व-लॉकडाउन स्तर पर वापस आ गई। नरेंद्र मोदी द्वारा मई में घोषित जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर एक प्रोत्साहन पैकेज, जिसमें बैंक ऋण पर क्रेडिट गारंटी और गरीबों को मुफ्त अनाज शामिल हैं। इस पर कई अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि उस समर्थन का अधिकांश हिस्सा पहले से ही सरकार द्वारा बजट में लिया गया था और इसमें बहुत कम खर्च शामिल था।

जमीनी सच्चाई – राहत पैकेजों की –

लॉक डाउन के बाद सरकार ने घोषणाओं का अम्बार लगा दिया लेकिन किस के लियें यह बड़ा सवाल हैं की    व्यपारी वर्ग जो की पहले से आर्थिक आधार पर लगभग सम्पन्न हैं उसे तो सरकार ने लाभ दे दिया लेकिन देश की बड़ी आबादी जिसकी जनसंख्या 65 करोड़ से अधिक हैं जिसमे गरीब वर्ग व् मध्यम वर्ग की शामिल में उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई हैं जिसकी सरकार को कोई चिंता नहीं हैं और सिर्फ घोषणा ओं  में याद रहता हैं |

रोटी बनाम मौत –

लॉक डाउन के नाम से ही  प्रवासी मजदुर ब्रज मोहन की रूह काँप गई जब हमारे  संवादाता ने उससे पूछा लॉक डाउन को एक वर्ष पूरा हो रहा हैं आपका अनुभव कैसा रहा उदासी मन से चेहरे पर मासूमियत लाचारी से रो – आंसू से बोल पड़ा साहब हम तो मजदुर हैं 2 वक्त की रोटी के लियें अपने छोटे बच्चे , पत्नी , परिवार को छोड़ यहाँ  मजदूरी  करने आते हैं पिछले साल जब मोदी जी ने एक साथ लॉक डाउन कर दिया था कुछ समझ ही नहीं आया सब जैसे थे वैसे भी भाग रहें थे कुछ समझ ही नहीं आया हम भी डर गयें थे और अपने गाँव जाने के लियें बस स्टेशन पहुचें पुलिस ने लाठियों से मारा सब बंद हो चूका था में अकेला पैदल ही चल पड़ा बिहार के लियें 2 दिन तक तो भूखा ही चलता रहा कोने कोने पर पुलिस ने पूछताछ की ऐसा लग रहा था जैसे में और किसी देश में हूँ सरकार ने तरफ से कोई मदद नहीं मिली लेकिन रास्ते में गाँवों वालों ने हमारी मदद की और खाने के लियें खाना दिया भगवान ऐसा दिन किसी को ना दिखायें अब आज धंधे खत्म हो चुके हैं पहले नोटबंदी से काम धाम खत्म से हो चुके थे उसके बाद लॉक डाउन ने तो जीते जी मार दिया आज हम दिल्ली आयें थे काम की तलाश में लेकिन अब सुनने में आ रहा हैं की कोरोना की दूसरी लहर के कारण सरकार लॉक डाउन कर सकती हैं तो हम सभी साथी वापस अपने गाँव जा रहें हैं अब या तो भूख से मर जायेगें या कोरोना से हम गरीब हैं मजदूरी करते हैं परिवार के बीच मरेगें तो सुकून मिलेगा |    

क्या कहती हैं जनता –

जयपुर राजस्थान से सामाजिक कार्यकर्त्ता अनिल गोस्वामी ने कोरोना की दूसरी लहर की संभावनाओं पर कहा हैं की चाहे केंद्र की मोदी सरकार हो या किसी भी राज्य की सरकार हो उसकी पहली ज़िम्मेदारी यह बनती हैं की वह देश की जनता के बचत खाते में सीधे आर्थिक पैकेज पहुचायें और इसके साथ ही अन्य सुविधाओं की व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दे , घोषणों से जनता का भला नहीं होने वाला सरकार अपनी जिम्मेदारया स्वयं तय करें |

हेमलता कंसोटिया – महिला सामाजिक कार्यकर्ता नई दिल्ली ने पुन : लॉक डाउन की पुनरावर्ती के संभावनाओं पर कहा हैं की हम लम्बे समय से मजदुर वर्ग के साथ काम कर रहें हैं  लेकिन मजदुर वर्ग की जो दयनीय स्थिति लॉक डाउन में हुई हैं आज आप उन मजदूरों से पूंछ के देखे की उन्होंने क्या पीड़ा सहन करी हैं और कितने ही मजदुर मौत को गले लगा चुके हैं आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण सरकार लॉक डाउन को छोड़ अन्य विकल्पों पर ध्यान दे तो ज्यदा अच्छा हैं |   

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